लिंगदोह का श्राद्ध और बैंक्वेट हॉल की क्रांति
हमारे मुल्क में किसी भी भली व्यवस्था को ठिकाने लगाने का सबसे अचूक नुस्खा है—उस पर एक कमेटी बैठा देना। कमेटी बैठती है, सरकारी बिस्कुट चबाती है, गंभीर मुखमुद्रा बनाकर चार पन्नों की रिपोर्ट सौंपती है और फिर मोक्ष पा जाती है।
लिंगदोह समिति और पांच हजार रुपये की चुनावी सीमा
ऐसी ही एक मासूम आत्मा जे.एम. लिंगदोह की थी। उन्होंने बड़ी संजीदगी से फरमान जारी किया था कि कॉलेज का नौजवान छात्रसंघ चुनाव में पाँच हज़ार रुपये से ज़्यादा नहीं फूंकेगा। पाँच हज़ार! आज इतने में तो किसी छुटभैये नेता की गाड़ी का दो दिन का तेल भी नहीं जलता, मगर साहब का ख़्याल था कि इतने चिल्लर में परिसर के अंदर गांधी और लोहिया जनम ले लेंगे। लिंगदोह जी शायद यह भूल गए कि हमारे यहाँ चुनाव उसूलों से नहीं, जुगाड़ और दावतों से लड़े जाते हैं।
एमबीपीजी कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव का बदलता रंग
हल्द्वानी के एमबीपीजी कॉलेज की सड़क पर निकलिए, तो लोकतंत्र अपने असली रंग-रूप में लोटता दिखाई देता है। चुनाव का बिगुल फूँकते ही शहर के बैंक्वेट हॉल अचानक ‘वैचारिक विमर्श’ के अड्डे बन जाते हैं। जिस हॉल में दो दिन पहले किसी लाला की बिटिया के फेरे हो रहे थे, वहाँ अब भारी-भरकम बेस वाले स्पीकरों पर छात्र राजनीति की छाती कूटी जा रही होती है।
बैंक्वेट हॉल में दावत और छात्र राजनीति
अंदर झांकिए, तो अजब नज़ारा दिखता है। कानफाड़ू धुनों पर लड़के अपनी कमर मटका रहे हैं और कोने में बुफे का महायज्ञ चल रहा है। कड़ाही पनीर के गाढ़े रसे में क्रांति तैर रही है और रायते के बूंदी में भविष्य के भारत का निर्माण हो रहा है। प्लेटें खड़क रही हैं, रसगुल्लों पर छीना-झपटी मची है और इसी को कुछ लोग ‘छात्र राजनीति का स्वर्णिम दौर’ कह रहे हैं।
अगर किसी सीधे-सादे प्रोफेसर ने टोक दिया कि भाई यह पाँच हज़ार की सीमा कहाँ गई, तो प्रत्याशी बत्तीसी चमका कर जवाब दागता है—”सर, हमने कहाँ एक धेला भी लगाया! यह तो हमारे गौलापार वाले बबलू भैया का बड़प्पन है। नए लड़कों को देखकर उनका मन पसीज गया, सो उन्होंने अपनी तरफ से स्नेह-मिलन रख दिया। हम तो बस चरण छूने चले आए थे।”
चुनावी खर्च और ‘समाजसेवा’ का खेल
इस धरती पर दानवीर कर्ण के बाद अगर कोई सबसे बड़ा परोपकारी पैदा हुआ है, तो वह शहर का स्थानीय ठेकेदार, भू-माफिया और विधायकी का ख्वाब देखने वाला नेता है। इनको अचानक रात में इलहाम होता है कि कॉलेज के लौंडों को जब तक मुफ्त का चिकन-पनीर नहीं खिलाया जाएगा, तब तक सनातन संस्कृति और जनतंत्र दोनों गहरे संकट में रहेंगे। सुबह होते ही गाड़ियों की बुकिंग हो जाती है, बैंक्वेट हॉल का बिल किसी ‘समाज कल्याण ट्रस्ट’ के नाम फटता है और शाम को लोकतंत्र का मुजरा शुरू।
यह कोई समाजसेवा नहीं, सीधा-सपाट सट्टा है। आज छात्र नेता पर दस लाख दांव पर लगाए जा रहे हैं, ताकि कल जब वह किसी पार्टी का चपरासी या पदाधिकारी बने, तो ज़मीनों के लफड़ों, सरकारी टेंडरों और थाने की दलाली में काम आए।
कॉलेज प्रशासन और चुनाव आचार संहिता
उधर कॉलेज प्रशासन का हाल ऐसा है जैसे घर का वह लाचार बुजुर्ग, जिसे पता सब है कि दाल में काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है, मगर चुपचाप खांसकर कंबल ओढ़ लेता है। प्राचार्य जी कमरे में बैठकर रस्म अदायगी वाला नोटिस टाइप कराते हैं—”पोस्टर हाथ से बने हों, दीवारों पर कालिख न पोती जाए।” उधर गेट के बाहर उसी नोटिस के पन्ने पर समोसा रखकर छात्र नेता हरी चटनी का स्वाद ले रहे होते हैं। पूरे शहर की छाती पर भारी-भरकम होर्डिंग टंगे हैं, काफिले हूटर बजाकर धूल उड़ा रहे हैं और आचार संहिता मुँह छिपाए नाली किनारे बैठी रो रही है।
पहाड़ से आए छात्रों पर छात्र राजनीति का असर
पहाड़ के किसी दूरदराज गांव से बीए की पढ़ाई करने उतरा सीधा-साधा लड़का भी हफ्ता भर में इस व्यवस्था का मुरीद हो जाता है। वह समझ लेता है कि लाइब्रेरी में बैठकर चश्मा घिसने से कुछ हासिल नहीं होना; असली हुनर तो किसी रसूखदार की गाड़ी के पायदान पर लटककर हूल देने में है।
चुनाव खत्म होने के बाद क्या बचेगा?
हफ्ता-दस दिन में यह तमाशा निपट जाएगा। कोई एक सूरमा जीतकर अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान होगा। शपथ लेने के बाद वह बड़े गर्व से एक शपथ-पत्र पर दस्तखत करेगा कि उसने चुनाव में कुल ४,८५० रुपये खर्च किए—डेढ़ सौ रुपये उसने ईमानदारी की मिसाल पेश करते हुए बचा भी लिए!
फाइल बस्ते में बंध जाएगी, बैंक्वेट हॉल का फर्श फिनाइल से धोकर अगले लगन की बारात के लिए खाली कर दिया जाएगा। और लोकतंत्र? वह सड़क की पटरी पर खड़ा होकर किसी नेता की फॉर्च्यूनर का धुआं फांकता रहेगा, इस भरोसे के साथ कि अगले साल फिर कोई चुनाव आएगा और कम से कम दो वक्त का पेटभर खाना तो मुफ्त में नसीब होगा ही।








